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आदि पर्व
अध्याय ९२
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादय़न्ती मनो गिरा |  ३३   क
भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति