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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
अतस्तवाक्षय़ा लोकाः स्वशरीरेण भारत |  २१   क
प्राप्तोऽसि भरतश्रेष्ठ दिव्यां गतिमनुत्तमाम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति