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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
स्थानेऽस्मिन्वस राजेन्द्र कर्मभिर्निर्जिते शुभैः |  ३१   क
किं त्वं मानुष्यकं स्नेहमद्यापि परिकर्षसि ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति