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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
अद्यापि मानुषो भावः स्पृशते त्वां नराधिप |  ३३   क
स्वर्गोऽय़ं पश्य देवर्षीन्सिद्धांश्च त्रिदिवालय़ान् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति