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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
सरथं कृतवर्माणं समन्तात्पर्यवाकिरत् |  ४९   क
छादय़ित्वा रणेऽत्यर्थं हार्दिक्यं तु स सात्यकिः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति