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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्र स्नातस्य ते भावो मानुषो विगमिष्यति |  २७   क
गतशोको निराय़ासो मुक्तवैरो भविष्यसि ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति