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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
लोहकुम्भ्यः शिलाश्चैव नादृश्यन्त भय़ानकाः |  ५   क
विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्ततः |  ५   ख
ददर्श राजा कौन्तेय़स्तान्यदृश्यानि चाभवन् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति