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सभा पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षसहस्रकैः |  १४   क
श्रद्दधानेन सततं शिष्टसम्प्रतिपत्तय़े ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति