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सभा पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
तदाहृत्य तु तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम् |  १७   क
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमय़ीं शुभाम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति