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सभा पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
न दाशार्ही सुधर्मा वा व्रह्मणो वापि तादृशी |  २४   क
आसीद्रूपेण सम्पन्ना यां चक्रेऽप्रतिमां मय़ः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति