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सभा पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
मणिरत्नचितां तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः |  ३०   क
दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात्प्रपतन्त्युत ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति