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सभा पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सभां करिष्यामि पाण्डवाय़ यशस्विने |  ४   क
मनःप्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति