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वन पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पोपहारैर्वलिभिरर्चय़ित्वा दिवाकरम् |  १४   क
योगमास्थाय़ धर्मात्मा वाय़ुभक्षो जितेन्द्रिय़ः |  १४   ख
गाङ्गेय़ं वार्युपस्पृष्य प्राणाय़ामेन तस्थिवान् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति