वन पर्व  अध्याय ३

वैशम्पाय़न उवाच

प्रस्थितं मानुय़ान्तीमे व्राह्मणा वेदपारगाः |  २   क
न चास्मि पालने शक्तो वहुदुःखसमन्वितः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति