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वन पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
सुरपितृगणय़क्षसेवितं; ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् |  ३१   क
वरकनकहुताशनप्रभं; त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति