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वन पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधय़ा भृशम् |  ५   क
ततोऽनुकम्पय़ा तेषां सविता स्वपिता इव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति