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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा |  २   क
उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति