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उद्योग पर्व
अध्याय ३
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सात्यकिरु उवाच
कथं हि धर्मराजस्य दोषमल्पमपि व्रुवन् |  ५   क
लभते परिषन्मध्ये व्याहर्तुमकुतोभय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति