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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ |  १४   क
लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति