वन पर्व  अध्याय २६४

मार्कण्डेय़ उवाच

द्व्यक्षीं त्र्यक्षीं ललाटाक्षीं दीर्घजिह्वामजिह्विकाम् |  ४४   क
त्रिस्तनीमेकपादां च त्रिजटामेकलोचनाम् ||  ४४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति