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भीष्म पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
इह कीर्तिं परे लोके दीर्घकालं महत्सुखम् |  ४६   क
प्राप्स्यन्ति पुरुषव्याघ्राः प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति