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द्रोण पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित्समश्नुते |  १०   क
यत्र धर्मपरो वृद्धः शेते भुवि भवानिह ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति