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द्रोण पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अद्य प्रभृति सङ्क्रुद्धा व्याघ्रा इव मृगक्षय़म् |  १३   क
पाण्डवा भरतश्रेष्ठ करिष्यन्ति कुरुक्षय़म् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति