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द्रोण पर्व
अध्याय २
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सञ्जय़ उवाच
हते तु भीष्मे रथसत्तमे परै; र्निमज्जतीं नावमिवार्णवे कुरून् |  ३   क
पितेव पुत्रांस्त्वरितोऽभ्ययात्ततः; सन्तारय़िष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति