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द्रोण पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्ड; ममृष्यमाणो भवतानुशिष्टः |  २३   क
आशीविषं दृष्टिहरं सुघोर; मिय़ां पुरस्कृत्य वधं जय़ं वा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति