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सभा पर्व
अध्याय ५४
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युधिष्ठिर उवाच
संह्रादनो राजरथो य इहास्मानुपावहत् |  ५   क
जैत्रो रथवरः पुण्यो मेघसागरनिःस्वनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति