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कर्ण पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
संस्तभ्य च मनो भूय़ो राजा धैर्यसमन्वितः |  ११   क
पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छत सञ्जय़म् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति