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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
विनिर्भिन्नाः शरैस्तीक्ष्णैर्निपेतुर्धरणीतले |  ९३   क
शरातुरास्तथैवान्ये दन्तिनो विद्रुता दिशः ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति