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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
उह्यमानश्च कृष्णेन वाय़ुनेव वलाहकः |  २२   क
तावकं तद्वलं राजन्नर्जुनोऽस्त्रविदां वरः |  २२   ख
गहनं शिशिरे कक्षं ददाहाग्निरिवोत्थितः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति