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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
न स्मराम्युक्तपूर्वां वै स्वैरेष्वप्यनृतां गिरम् |  ९७   क
तेन सत्येन तावद्य ध्रिय़ेतां श्वशुरौ मम ||  ९७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति