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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
वाय़ुनेव विधूतानि तवानीकानि सर्वशः |  २८   क
शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समन्ततः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति