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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
को वेह स पुमानस्ति यो विजेष्यति पाण्डवम् |  ३३   क
तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विविधानि महात्मनः |  ३३   ख
गाण्डीवस्य च निर्घोषो वीर्याणि हरते हि नः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति