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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
नष्टचन्द्रा यथा रात्रिः सेनेय़ं हतनाय़का |  ३४   क
नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति