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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
आत्मनोऽर्थे त्वय़ा लोको यत्नतः सर्व आहृतः |  ४०   क
स ते संशय़ितस्तात आत्मा च भरतर्षभ ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति