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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
हीय़मानेन वै सन्धिः पर्येष्टव्यः समेन च |  ४२   क
विग्रहो वर्धमानेन नीतिरेषा वृहस्पतेः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति