शल्य पर्व  अध्याय ३५

वैशम्पाय़न उवाच

त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते |  २९   क
निमग्नं भरतश्रेष्ठ पापकृन्नरके यथा ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति