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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
न जानीते हि यः श्रेय़ः श्रेय़सश्चावमन्यते |  ४४   क
स क्षिप्रं भ्रश्यते राज्यान्न च श्रेय़ोऽनुविन्दति ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति