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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
प्रणिपत्य हि राजानं राज्यं यदि लभेमहि |  ४५   क
श्रेय़ः स्यान्न तु मौढ्येन राजन्गन्तुं पराभवम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति