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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
तं मृधे वेगमास्थाय़ परं परमधन्विनः |  ३   क
चोदितास्तव पुत्रैश्च सर्वतः पर्यवारय़न् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति