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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अभिज्ञानं नरेन्द्राणां विकृतं प्रेक्ष्य संय़ुगे |  ५   क
पतितान्रथनीडांश्च रथांश्चापि महात्मनाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति