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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रशः |  ७   क
कृपाविष्टः कृपो राजन्वय़ःशीलसमन्वितः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति