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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
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गुरुरु उवाच
इत्युक्तवन्तं ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् |  १३   क
पुनः संशय़मापन्नाः पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति