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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
ते तु संमानिता राजंस्त्वय़ा राज्यहितार्थिना |  १२   क
प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वं कौरवनन्दन ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति