आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ४८

ऋषय़ ऊचुः

किं स्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेय़तमं स्मृतम् |  १४   क
व्याहतामिव पश्यामो धर्मस्य विविधां गतिम् ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति