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शान्ति पर्व
अध्याय ३०
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वासुदेव उवाच
उपतस्थे च भर्तारं न चान्यं मनसाप्यगात् |  ३२   क
देवं मुनिं वा यक्षं वा पतित्वे पतिवत्सला ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति