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शान्ति पर्व
अध्याय ३०
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वासुदेव उवाच
अत्र ते कथय़िष्यामि यथा वृत्तं जनेश्वर |  ४   क
नारदः पर्वतश्चैव प्रागृषी लोकपूजितौ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति