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शान्ति पर्व
अध्याय ३०
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वासुदेव उवाच
सानुनीता वहुविधं पर्वतेन महात्मना |  ४१   क
शापदोषं च तं भर्तुः श्रुत्वा स्वां प्रकृतिं गता |  ४१   ख
पर्वतोऽथ यय़ौ स्वर्गं नारदोऽथ यय़ौ गृहान् ||  ४१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति