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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
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पितर ऊचुः
इति त्वमपि जानीहि राम मा क्षत्रिय़ाञ्जहि |  ३०   क
तपो घोरमुपातिष्ठ ततः श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति