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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
स ददर्शाश्रमं दूराद्राजर्षेस्तस्य धीमतः |  १७   क
शतय़ूपस्य कौरव्य धृतराष्ट्रस्य चैव ह ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति