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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रमुदितः सर्वो जनस्तद्वनमञ्जसा |  १८   क
विवेश सुमहानादैरापूर्य भरतर्षभ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति